Thursday, February 25, 2016

Love for the motherland - Meditation 1

You can cut it up and sell it all, bit by bit - time, labour, eyes, kidneys, womb, even the heart. The one thing you can't buy - or snatch - is human love, and a country.

Country. Who knows how it grows inside of you? What is this love? For the land? For mother? For yourself?

Motherland. The mother and the earth.

Perhaps they call a country 'mother' because you don't get to choose it. You don't get to choose whether or not you are going to love her. At least, not when you're young. The mother - who can be a sister too, or a grandmother, or a father; anybody who looks after you - is the source of self-definition.

A country - a motherland, a homeland - is a feeling that we associate with mother, with home.

Not everyone is happy at home. Not everyone is safe at home with mother. Children run away sometimes, when there is not enough love and too much fear in the air. A child begins to wonder if the mother is truly helpless, unable to keep him (or her) safe. Perhaps she is not free. It takes a long time before a child loses faith in the mother - when he tries to win her love and keeps failing, when he cannot count on her to be fair, when he is humiliated.

There's this novel. Saul Bellow's Herzog. The protagonist is in a courthouse and happens to hear the proceedings in a case of murder. A mother is accused of killing her child. Smashed the child's head against the wall.

A witness says that the child was crying. Trying to cling to the mother. She would throw him back against the wall. He would keep howling (for his mother), keep trying to seek safety (with his mother). So it went until the child fell silent and that was only when he was dying.

This happens, too.

Not everyone is willing to love, no matter what. Sometimes people get confused - they mix up love with want. Love is not the feeling of wanting to have/own someone; it is the feeling of belonging with someone. And love for the motherland? That is already a given - you already know you belong. There is no doubt, no question. You take the motherland for granted.

If a child is screaming, his mother does not have the right to throw him against a wall. You don't ask children to offer proof of love. A mother may or may not be able to give the child all he needs but it is her responsibility to at least give him love - it is her primary dharma.

You can't force love for a country. It is impossible. A country is not a thing that can be 'had'. You can have power, you can have a seat at the head of the table. But not a country. A country cannot belong to you. You must belong to her. A country is a feeling - the feeling spells 'mother'; it spells 'home'. This love, this feeling of belonging is not something you can pick up in the market, not is it a sword dangling above your head. Where there is fear, no love can survive.


देश प्रेम पे ध्यान - १.

पुर्ज़ा-पुर्ज़ा कोई बेचना चाहे, बेच सकता है - इंसान का समय, उसका ख़ून, उसकी आँखे, गुर्दा, गर्भ, यहाँ तक की उसका दिल. सब बिकता है, या छीना जा सकता है। सिर्फ़ उसका प्यार और उसका देश महफूज़ है।

देश। पता नहीं कैसे बनता है ये लगाव। किससे? मिट्टी से? माँ से? अपने आप से?

Motherland. माँ-मिट्टी।

शायद इसीलिए देश को माँ कहते हैं - इसमें फ़ैसले की गुंजाईश नहीं। माँ से प्रेम करना, न करना, अपने बस में नहीं है। कम से कम, बचपन में नहीं। माँ... जो देखभाल करे। दीदी हो, नानी हो, बाप हो - कोई भी माँ बन सकता है। बच्चे का अस्तित्व उसी से है।

देश - वतन, मुल्क़ - ऐसा एहसास होगा, माँ वाला एहसास।  घर वाला एहसास।

हर कोई घर पे ख़ुश नहीं होता। माँ के पास सुरक्षित भी नहीं होता। भाग जाते हैं बच्चे घर से, जब प्यार कम और डर ज़्यादा हो। बच्चे के मन में आता है, माँ शायद मजबूर है। शायद ग़ुलाम है। बहुत मुश्किल से बच्चे का विश्वास टूटता है - जब लाख कोशिश के बाद भी माँ प्यार नहीं दिखाती, इंसाफ़ नहीं करती, या बच्चे की बेइज़्ज़ती करती है।

मैंने एक किताब पढ़ी थी - Saul Bellow की Herzog ... कचेहरी में एक शख़्स जाता है; किसी और के क़त्ल की सुनवाई है।  एक माँ ने बच्चे को मार डाला।  दीवार से उसका सर पटक-पटक के।  

बच्चा रो रहा था, रोते-रोते माँ से लिपट जाता। माँ उसे उठा कर दीवार की तरफ़ फ़ेंक देती। बच्चा फिर माँ से लिपटने की कोशिश करता। माँ फ़िर दूर पटक देती। ऐसा होता रहा जब तक बच्चा ख़ामोश ना हुआ। ख़ामोश तभी हुआ जब मर गया। 

ऐसा भी होता है, है न? 

हर कोई, हर हाल में प्रेम नहीं करता। लोगों को कभी-कभी ग़लत फ़हमी हो जाती है, वो प्रेम और चाहत में फ़र्क़ नहीं कर पाते। प्रेम वो है जिसमें आप किसी को हासिल नहीं करना चाहते, बल्कि ख़ुद उसके हो जाना चाहते हैं। और देश प्रेम? इसमें तो कोई सवाल नहीं, कोई शक नहीं, क्योंकि आप तो पहले से देश के हवाले हैं। You take the motherland for granted. बच्चा चीख़ रहा है तो माँ, दीवार पे उसका सर नहीं पटक सकती। माँ को हक़  नहीं है। बच्चों से प्रेम का प्रमाण नहीं माँगा जाता। माँ ज़रूरतें पूरी कर पाये या नहीं, प्यार दिखाना उसका पहला और आख़री धर्म है।

और देश प्रेम में ज़ोर-ज़बरदस्ती मुमकिन नहीं, क्योंकि देश हासिल करने की चीज़ नहीं। सत्ता हासिल है, कुर्सी हासिल है। देश हासिल नहीं। एक एहसास है, माँ वाला, घर वाला। ये एहसास, ये लगाव ना बाज़ार की चीज़ है ना ही सर के ऊपर लटकती तलवार। जहाँ डर है, वहाँ प्रेम कैसे हो सकता है?

Tuesday, February 23, 2016

How we deal with anti-nationals


First of all, Bharat Mata ki Jai.

Offering to put a bullet into them, hanging, beating them to death - this is not how we deal with anti-nationals. 'We' means some Indians, like cops and law-makers, on behalf of all citizens. We don't just kill them -
Kill them

- though that too has happened. What we do is, we arrest them. Sometimes, we talk nicely. Five minutes. Or even an hour. Sometimes, we take a guy for a long drive. 

He is shaken. If any stranger shows up at your house, says he is a cop or a spy (Intelligence), you are already nervous.

if he is innocent, why nervous

We call him to the station, or we pick him up from home. We don't say where we're going exactly. To the family, we say things like, we'll bring him back. Or, we ask: Is there a reason for you to be worried about him talking to us? The family keeps quiet. No matter what they say now, it will make things worse.

Is she Kashmiri?

Monday, February 08, 2016

aurat aur mandir

कल अख़बार देख कर मेरी माँ ने कहा, अगर शनी मंदिर में औरतों को जाने की इजाज़त नहीं है, तो ना जाएँ। क्या फ़र्क़ पड़ता है?

एक पल को मैंने भी सोचा, ठीक बात है, नुक़सान तो मंदिर का ही है। मैंने ख़ुद तय किया है, किसी ऐसी जगह नहीं जाऊँगी जहाँ औरतों को बराबर दर्जा मिलता। आधी आबादी बॉयकॉट करेगी, अपने आप अक़ल ठिकाने लग जायेगी।

कुछ साल पहले तक मैं दिल्ली के निज़ामुद्दीन दरगाह जाती थी, लेकिन मज़ार पहुँचने से पहले मुझसे फूलों की टोकरी ले ली जाती, मज़ार को हाथ नहीं लगाने दिया जाता। मैं बाहर बैठी क़व्वाली सुनती लेकिन मन में अंगारे भड़कते रहते। आख़िर मन इतना खट्टा हो गया कि मैंने जाना ही छोड़ दिया। मुंबई में हाजी अली भी नहीं गयी।

आख़िर दरगाह जाने वालों को सूफ़ी की मोहब्बत खीँच लाती है। सूफ़ी संतों की सबसे ख़ास बात यह थी, वे भेद-भाव नहीं करते थे - न जात-पात, या मज़हबी कट्टरपन। मानने वालों में औरत और मर्द बराबर हुआ करते थे। ये औरतों से छुआ-छूत का चलन नया है। आज से पंद्रह-बीस साल पहले, जब मैं पहली बार हाजी अली और निज़ामुद्दीन के दरगाह गई, किसी ने मुझे रोका नहीं। और जब सूफ़ी संत ख़ुद जीते जी औरतों को दूर न रखते, किसी को क्या हक़ है हमें रोकने का?

अक्सर ख़ादिम मज़ार को अपनी जागीर समझते हैं, ठीक उसी तरह जैसे पंडित मंदिरों को अपना गढ़।

मंदिर हो या दरगाह, इनका वजूद भक्तों से है, और उनके दिए चढ़ावे से - फ़ूल, प्रसाद, कील, रोली, नारियल, चादर और पैसे। सबसे बड़ी बात - पैसे। तो मैंने भी ठान ली - एक कौड़ी न दूँगी। अगर औरत की देह से इतनी तकलीफ़ है, तो इसी देह की मेहनत से कमाए पैसों पे क्यों हाथ मारने दूँ? इसी देह में पनपती है श्रद्धा, और ग़दर भी।

लेकिन फिर मन में एक और बात आई - अगर ये लोग ('ये' लोग जो तय करते हैं, औरत को क्या आज्ञा है, कहाँ प्रवेश है, कहाँ नहीं) कल ये कह दें कि औरत का हर मंदिर में प्रवेश निषेध है, तो? अगर वो ये कहें, देव ही नहीं, देवी की मूरत को भी औरत छू नहीं सकती, तो? और किसी दिन अगर वो ये कह दें कि औरत का पढ़ना-लिखना धर्म के ख़िलाफ़ है, तो?

बहुत दूर की बात नहीं कह रही। औरत को क्या हासिल है , क्या मना है, ऐसे फ़रमान हर मज़हब में जारी हुए हैं। जाती के नाम पे मर्दों पे भी हर तरह की पाबंदी लगायी गई। इतिहास (और वर्तमान) गवाह है, मर्द-औरत-बच्चे सब पे धर्म और मज़हब के नाम पे लोगों ने ऐसे सितम ढाए कि सुन के रूह काँप जाती है। और जब भी परिवर्तन आया है, बहुत लड़ने के बाद ही आया है।

ये मसला सिर्फ़ मंदिर-मस्जिद-दरगाह में प्रवेश का नहीं है। मसला औरत और शमशान में दाह संस्कार, औरत और क़ब्रिस्तान, औरत और स्कूल-कॉलेज-व्यवसाय का भी है। औरत की देह पे हर तरह की पाबन्दियाँ हैं - यहाँ मत जाओ; उसके साथ मत जाओ; मर्ज़ी से शादी न करो; दोबारा शादी न करो; बच्चे पैदा करो; गर्भ-पात ना करो; सर अलावा शरीर के सारे बाल निकालो; दुबली-पतली रहो मगर इतनी भी दुबली नहीं के छाती चपटे तवे-सी लगे; टाँग छुपाओ; मुँह छुपाओ; सर धक के रखो; माहवारी रहते रसोई में न जाओ; आचार न छुओ; बेवा हो तो दुल्हन को न छुओ; बेवा हो तो खाना फीका खाओ, साड़ी सफ़ेद पहनो; जंग के मैदान में ना जाओ; गाड़ी ना चलाओ।

जो औरतें शनी मंदिर में और हाजी अली दरगाह में बराबर प्रवेश के हक़ के लिए लड़ रही हैं, शायद जानती हैं, पाबंदियों का कोई अंत नहीं, ना ही कोई तर्क। और अन्याय का एक ही जवाब है - संघर्ष।

This was published on BBChindi.com

Tuesday, February 02, 2016

A film about Indian women and books

I made a documentary film last year. It took a year and a half. It's out, DVDs available through the producer, PSBT. Here's the promo:




Here's a piece about it in The Hindu:

“This film is not about identity or self-definition as ‘writers,’” Zaidi says. “It is trying to look at women’s rights, concerns and freedoms, as reflected in literature. Identity is a very fluid and contextual construct. Caste may be most important outside the household, for instance, but within a household, womanhood may be her primary identity. And sometimes, the opposite might be true. However, all the women in the film have written about the feminine and female experience of life.”

If you're an institution, university, festival or a film club that wants to organize a screening, you can get in touch with me or PSBT. 
Tweets by @anniezaidi